की हर तरफ है सन्नाटा,
मैं तो रौशनी लिए चल रहा था
फिर मेरे पाँव क्यों लगा कांटा?
हाँ, है पाँव नंगे मेरे
है रेत में भी कदम धरे ,
धसने से मैं वाकिफ था
फिर पैर मेरे क्यों जले।
पानी का कोई नुक्ता था,
फिर क्यों चली हवा ऐसी
अब कुछ नहीं है दिखता।
है फिर वही सन्नाटा
दूर तलक यहाँ,
है कोई नहीं आता,
किसको दूँ आवाज़ मैं
किसको बनाऊ हमराज मैं,
ये मंजिल कोई और थी
कोई और था ये रास्ता।
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