बस जाती है कई बस्तियां, एक शहर को बसाने में।
अपने गावों से चलकर रोजी-रोटी के लिए शहर को आ जातें है ये लोग, फिर बस जाती है कई बस्तियाँ एक शहर को बसाने में, पर कहाँ चले जातें है? ये शहर को बसाने वाले, और कौन होते है ये लोग?
दिहाड़ी मजदूर, जिसकी सुबह इस संशय में होती है कि आज उसे काम मिलेगा या नहीं। नहा- धोकर सुबह ही पहुंच जातें है लेबर अड्डे पर जहाँ से उन्हें काम मिलना होता है. ये वो लोग होते है जो थोड़ा बहुत पढ़े-लिखें होते है पर गरीबी के कारण इन्हें अपने गावों से शहरों की तरफ पलायन करना पड़ता है. 2 जून की रोटी जुटाने लिए इन्हें तपती मई में भी काम करना पड़ता है. इनको न तो गर्मी चुभती है और न ही ठण्ड कपाती है. जाड़ा हो या गर्मी ये अपने बच्चें लिए निर्माणस्थल पर काम करते है. कोई नहीं होता वहां इनके बच्चों की देख-रेख करने वाला. सुबह 9 बजे से लेकर शाम के 5 बजे तक इन्हीं मजदूरी करनी होती है और सारे दिन कड़े शारीरिक श्रम के बाद इन्हें मजदूरी में सिर्फ दो-ढाई सौ रुपया मिलते है जिसमें इनको अपने परिवार का पालन-पोषन करना होता है.
Keep it up..
ReplyDeleteI am really glad to reading your both post dihadi majdoor and jugnu.
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