ये वीरानिया ये सूनापन
आखिर कब तक रहेगा?
क्या इस रात के बाद भी
कोई सूरज उगेगा ?
क्या इसी गुमनामी में
हम भी कहीं खो जायेंगे?
या प्रगति का सूरज देख के
प्रकति का भूल जायेंगे.
ये काला अँधेरा
बढ़ता ही जा रहा है.
जो प्रथ्वी के अंत का
लेखा बना रहा है.
क्यों शांत है हम सब
यह जानकर भी?
रोका नहीं अगर ऐसा होने से
तो जायेंगे प्राण से भी.
आखिर कब तक रहेगा?
क्या इस रात के बाद भी
कोई सूरज उगेगा ?
क्या इसी गुमनामी में
हम भी कहीं खो जायेंगे?
या प्रगति का सूरज देख के
प्रकति का भूल जायेंगे.
ये काला अँधेरा
बढ़ता ही जा रहा है.
जो प्रथ्वी के अंत का
लेखा बना रहा है.
क्यों शांत है हम सब
यह जानकर भी?
रोका नहीं अगर ऐसा होने से
तो जायेंगे प्राण से भी.

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