
आजा देखा मैंने अपने शहर को बदलते हुए. वो बदलाव कुछ यूँ था कि चौराहें पर पहुँचकर तो मै चकरा ही गया कि कहाँ आ गया हूँ मैं? पर रास्ता देती रोड और हवाला देते ट्रैफिक हवालदार ने मुझे रोड के दूसरे छोर पर पहुँचाया जहाँ पर पहुँचते ही मन में एक अजीब टाइप का सूनापन लगने लगा जैसा किसी के घर छोड़ने पर आता है. थोड़ा रुक कर नज़र दौड़ाई तो रोने वाली फीलिंग आने लगी. सच में उन्हें बेधखल कर दिया गया था. उनके अपने स्थान से, जहाँ वो कई वर्षों से रह रहें थें. वो सब जाना नहीं चाहते थें पर जा रहे थें उन्हें जबरदस्ती भेजा जा रहा था ट्राली में लादकर उनकें अपने शहर से वो भी बिना किसी कारण बताओ नोटिस के जहाँ उन्हें इसलिए बसाया गया था की वो शहर को छाव दे सकें जब मई-जून की चिलचिलाती धूप हो और धूल-कणों को अवशोषित कर शहर की आबो हवा को शुद्ध कर सके. अब बात आती है इसमें में क्यों दुखी हो रहा हूँ तो बता दूँ, कोई रिश्ता नहीं था मेरा उनकें साथ हम सिर्फ रास्ता और मुसाफ़िर थें जो मानो तो पत्थर न मानो तो भगवान् पर वो बिना कुछ लिए कई वर्षों से शहर के लिए खड़े थें किसी के लिए बिना किसी द्वेष भावना के, फिर अचानक मेरी नज़र पास में खड़े JCB और LMRC के बोर्ड पर पड़ी तो समझ आया. आ रही है. इधर भी मेट्रो आ रही है और शहर की धूप को छाव में बदलने वालो को शहर से दूर ले जा रही है. इतनी दूर जहाँ से दोबारा वापस आनें में इन्हें वर्षों लग जायेंगें पर मेरा शहर तो स्मार्ट हो रहा है बढ़ती पापुलेशन के मामले में, सुनकर अच्छा लगता है अब हम चौबीस करोड़ (UP ) हो गए है और अमेरिका जैसे देश को भारत का एक राज्य होते हुए पापुलेशन के मामले में हमनें पीछें छोड़ दिया! प्रथ्वी,जल,आकाश को तो हम ध्यान ही नहीं दे रहें बस सवार है प्रगतिरुपी मेट्रो पर जिसके आने से हमारे सुख चैन में कई गुना बढ़ौती होने वाली है.

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