Sunday, September 2, 2018

जुगनू



                         जुगनू




कहाँ छुपा के रखें है तुमने जुगनू ? 
जो शाम होते ही दिखतें थे,
अब तो सुबह भी हो जाती है तब भी नहीं 
दिखतें,
रात के अंधेरों में, ढूँढ़ता आज भी जाता हूँ उन्हें
उन सड़कों पर, जो जंगल की और जाती है पर 
नहीं दिखतें है वो,
उनकी रौशनी बिना रात अधूरी लगती है. भले ही
हमने दिवाली के लिए जुगनू लाइट बना ली हो


पर रात में अचानक उड़ती रौशनी को देखना और उसके पीछे दौड़ने का मज़ा ही कुछ और होता है पर अब कहाँ ढूँढू उन्हें मैं.
माना की उनमें से कुछ को पकड़कर कर एक बार बोतल में बंद किया था और दिन के लिए रख लिया था पर जो भी किया था उनकी रौशनी के लिए किया था. जानना चाहता था कि उनके पीछे बल्ब लगा हुआ है क्या और अगर लगा भी हुआ है तो तार क्यों नहीं दिखता और सुबह ये लोग कहाँ चले जाते है ? पर सुबह उनकें बॉडी में आत्मा न पाकर अपने आप को बड़ा पापी  महसूस किया उस दिन से प्रॉमिस भी किया की अब कभी नहीं कैद करूँगा किसी को. भगवन ने जिसको जैसा बनाया है उसे वैसे ही रहने दो और उनकी लाइफ में कोई दखलंदाजी मत करो. पर अब तो मैं ऐसा नहीं करता फिर भी क्यों नहीं दिखतें यूँ ही रात बीत जाती है आर्टिफीसियल रौशनी के नीचें पर वो शाम आज भी नहीं दिखती जब हम होते थे जुगनुओं के बीच.

                कभी-कभी सोचता हूँ वो भी बड़े हो गए होंगे हमारे जैसे क्यूंकि जब हम

बच्चें थे तो बहुत ही धमाचौकड़ी  मचाया करते थे शाम होते ही  पूरे गाँव में दौड़ना शुरू और फिर

छुप्पन-छुपायी खेलना, इसी बीच जुगनू भी अपने घरों से निकल आतें थे पर जैसे-जैसे गाँव शहर 

बने और हम बड़े हुए जुगनू भी बड़े होते गए उन्हें भी हमारे जैसे अपने कल की चिंता सताने लगी

 होगी और वो भी अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने अपने कैरिएर को लेकर कही और शिफ्ट हो गए 

होंगे.




Friday, April 20, 2018

दिहाड़ी मज़दूर



बस जाती है कई बस्तियां, एक शहर को बसाने में। 

अपने गावों  से चलकर रोजी-रोटी के लिए  शहर को आ जातें है ये लोग,  फिर बस जाती है कई बस्तियाँ एक शहर को बसाने में, पर कहाँ चले जातें है? ये  शहर को बसाने वाले, और कौन होते है ये लोग?

दिहाड़ी मजदूर, जिसकी सुबह इस संशय में  होती है कि आज उसे काम मिलेगा या नहीं। नहा- धोकर  सुबह ही पहुंच जातें है लेबर अड्डे पर जहाँ से उन्हें काम मिलना होता है. ये वो लोग होते है जो थोड़ा बहुत पढ़े-लिखें  होते है पर गरीबी के कारण इन्हें अपने गावों से शहरों की तरफ पलायन करना पड़ता है. 2 जून की रोटी जुटाने लिए  इन्हें तपती  मई में भी काम करना पड़ता है. इनको न  तो गर्मी चुभती है और  न ही ठण्ड कपाती है. जाड़ा हो या गर्मी ये अपने बच्चें लिए निर्माणस्थल पर काम करते है. कोई नहीं होता वहां इनके बच्चों  की देख-रेख करने वाला. सुबह 9 बजे से  लेकर शाम के 5  बजे तक इन्हीं मजदूरी करनी होती है और सारे दिन कड़े शारीरिक श्रम के बाद इन्हें मजदूरी में सिर्फ दो-ढाई सौ रुपया मिलते है जिसमें इनको अपने परिवार का पालन-पोषन करना होता है.


Saturday, March 31, 2018

BLACK ENVIRONMENT

          ये वीरानिया  ये सूनापन
        आखिर कब तक रहेगा?
         क्या इस रात के बाद भी
              कोई सूरज उगेगा ?
                                   
 क्या इसी गुमनामी में
 हम भी कहीं खो जायेंगे?
 या प्रगति का सूरज देख के
 प्रकति का  भूल जायेंगे.
                           
                                                                               ये काला अँधेरा
                                                                           बढ़ता ही जा रहा है.
                                                                                                जो प्रथ्वी के अंत का
                                                                                                      लेखा बना रहा है.
                         
                                    क्यों शांत है हम सब
                                    यह जानकर भी?
                                    रोका नहीं अगर ऐसा होने से
                                    तो जायेंगे प्राण से भी.


मेरा फ्यूचर

यूँ  मुस्कुराकर मुझसे
कहने लगा भविष्य मेरा,
है चाह तुझमें दिन की
पर दूर है सवेरा,
                                   पहले ढूंढ उस सूरज को
                                      जिसके पास है सवेरा,
                                   फिर चाह करना दिन की
                                            और मुस्कुराना मेरा,
फिर देख सपने प्यारे
 अपने उज्वल कल के
फिर एक -एक करके तू बुनना उनको
होगी पूरी चाहत तभी तेरी कल को,


तुझमें है असीम समर्थ
क्यों करता नहीं उपयोग?
कुछ कम ऐसा कर जिससे
तुझको पहचाने लोग,
                 
वर्ना लोगों की भीड़ मेंतू
 कहीं खो जायेगा
फिर तुझको मुस्कुराना
मेरा याद आएगा।

मेट्रो आ रही है

आजा देखा मैंने अपने शहर को बदलते हुए. वो बदलाव कुछ यूँ था कि चौराहें पर पहुँचकर तो  मै चकरा ही गया कि कहाँ आ गया हूँ मैं?  पर रास्ता देती रोड और हवाला देते ट्रैफिक हवालदार ने मुझे रोड के दूसरे छोर पर पहुँचाया जहाँ पर पहुँचते ही मन में एक अजीब टाइप का सूनापन लगने लगा जैसा  किसी के घर छोड़ने पर आता है. थोड़ा रुक कर नज़र दौड़ाई तो रोने वाली फीलिंग आने लगी. सच में उन्हें बेधखल कर दिया गया था. उनके अपने स्थान से,  जहाँ वो कई वर्षों  से रह रहें थें. वो सब जाना नहीं चाहते थें पर जा रहे थें  उन्हें जबरदस्ती भेजा जा रहा था ट्राली में लादकर उनकें अपने शहर से वो भी बिना किसी कारण बताओ नोटिस के जहाँ उन्हें इसलिए बसाया गया था की वो शहर  को छाव दे सकें जब मई-जून की चिलचिलाती धूप हो और धूल-कणों को अवशोषित कर शहर की आबो हवा को शुद्ध कर सके. अब बात आती है इसमें में क्यों दुखी हो रहा हूँ तो बता दूँ, कोई रिश्ता नहीं था मेरा उनकें साथ हम सिर्फ रास्ता और मुसाफ़िर थें जो मानो तो पत्थर न मानो तो भगवान् पर वो बिना कुछ लिए कई वर्षों से शहर के लिए खड़े थें किसी के लिए बिना किसी द्वेष भावना के, फिर अचानक मेरी नज़र पास में खड़े JCB  और LMRC  के बोर्ड पर पड़ी तो समझ आया. आ रही है. इधर भी मेट्रो आ रही है और शहर की धूप को छाव में बदलने वालो को शहर से दूर ले जा रही है. इतनी दूर जहाँ से दोबारा वापस आनें में इन्हें वर्षों लग जायेंगें पर मेरा शहर तो स्मार्ट हो रहा है बढ़ती पापुलेशन के मामले में, सुनकर अच्छा लगता है अब हम चौबीस करोड़ (UP ) हो गए है और अमेरिका जैसे देश को भारत का एक राज्य होते हुए  पापुलेशन के मामले में  हमनें पीछें छोड़ दिया! प्रथ्वी,जल,आकाश को तो हम ध्यान ही नहीं दे रहें बस सवार है प्रगतिरुपी मेट्रो पर जिसके आने से हमारे सुख चैन में कई गुना बढ़ौती होने वाली है.







वाटर फॉर नेचर


गोल-गोल रानी इत्ता इत्ता पानी बचपन में पढ़ी इस कविता नें हमें सिर्फ मछली और पानी के होने को बताया है. काश हमनें ये भी पढ़ा होता गोल गोल रानी सिर्फ इतना सा है पानी तो आज  हम विश्व जल दिवस नहीं मना रहे होते. खैर इस वर्ष  22 मार्च को हमने विश्व जलदिवस का  25वाँ बर्थडे मनाया जिसका उद्धेश्य लोगो तक साफ़ और  सुरक्षित पानी पहुँचाना है. UNO द्वारा शुरू किये गए विश्व जलदिवस की इस  वर्ष की थीम है "वाटर फॉर नेचर" यानि प्रकति  के लिए पानी, अब प्रश्न उठता है कि ऐसी थीम बनाने की क्या जरुरत है?
प्रकति के  पास तो पहले से पानी है वो भी 97% जैसा की हम सब जानतें है फिर? पर जानकारी के लिए  बता दो  UNO ने इस बार लोगो से आग्रह किया है की पानी को बचाने के लिए ऐसे साधनों का प्रयोग में लाये जो प्रकति पर आधारित हो. जैसे पेड़ लगाना, नदियों को समतल से जोड़ना और जलचक्र को मेन्टेन रखने में सहायक जलभूमि को संरक्षित करना. गौरतलब है कि आज  दुनिया में 2.1बिलियन लोग  ऐसे है जिनके घरों में  पीने के लिए पानी नहीं  है और पानी के लिए उन्हें घर से दूर जाना पड़ता है और एक हम लोग है जो अपने  घरों में समरसेबिल लगवाए जा रहे है. शहर वाले तो गरदा मचाये है मानो सरकार ने कोई बिल लाया हो की घर में समरसेबिल  जरुरी है वर्ना बिजली का कनेक्शन काट दिया जायेगा. एक समय था जब घर में बम्बा और रोड पर सरकारी नल लगा हुआ करते थे  जिससे  हम सिर्फ उतना ही पानी उपयोग में लातें थें जितने की हमें जरुरत होती थी. टेक्नोलॉजी ने जहाँ हमें थोड़ा  सुस्ताने का मौका दे सरपट भागना सिखाया है वहीँ आनन-फानन में हमें पानी का अत्यधिक उपयोग करना भी सिखाया. हमारे द्वारा उपयोग किये पानी का 80% हम बिना यूज़ किये नालियों  में बहा देते हैं बिना ये सोंचे की यह धरती कितना देगी जिससे भूमिगत जलस्तर में गिरावट आ रही है जिसके बारें में हमें सोचने का टाइम ही नहीं मिलता है अब तो धरती रुखी नदिया सुखी जंगल को भी हमने साफ़ कर दिया है और रेन वाटर हार्वेस्टिं तो सिर्फ किताबों में ही पढ़ना अच्छा लगता है उसे आज भी हम जमीन  पर उतार नहीं पाएं है. अब वह दिन दूर  नहीं जब पानी पेट्रोल बन जायेगा और थोड़ा सा पानी पीने के लिए हम दूर भागेंगे.

पेन मेरा

आज पेन को देखकर याद आया कब से खाली पड़ा था ये कागज़ जिसे हमेशा ये सोचकर संजोय रखता था की जब लिखूंगा इसपे कुछ लिखूंगा  और ये कहकर न जाने कितने ...