Thursday, February 6, 2020

चादर

किस ख्वाब में उलझे हो जनाब?
एक काली रात
एक आधा चांद
सरसरती हवा में
कपकपाते तारें,
ये अभी तक इंतजार में हैं।
गर सुलझ गए हो तुम
तो बुन भी दो ना
इक चादर हमारी भी
कब तक यूंही बैठोगे
किसी के ख्वाब लिए ?
अब बुन भी दो ना
गर सुलझ गए हो तुम
एक चादर हमारी भी ।

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