जो शाम होते ही दिखतें थे,
अब तो
सुबह भी हो जाती है तब भी नहीं
दिखतें,
रात के
अंधेरों में, ढूँढ़ता आज भी जाता हूँ उन्हें
उन सड़कों पर, जो जंगल की और जाती है पर
नहीं दिखतें है वो,
उनकी रौशनी बिना रात अधूरी लगती है. भले ही
उनकी रौशनी बिना रात अधूरी लगती है. भले ही
हमने दिवाली के लिए जुगनू लाइट बना ली हो
पर रात में अचानक उड़ती रौशनी को देखना और उसके पीछे दौड़ने का मज़ा ही कुछ और होता है पर अब कहाँ ढूँढू उन्हें मैं.
माना की उनमें से कुछ को पकड़कर कर एक बार बोतल में बंद किया था और दिन के लिए रख लिया था पर जो भी किया था उनकी रौशनी के लिए किया था. जानना चाहता था कि उनके पीछे बल्ब लगा हुआ है क्या और अगर लगा भी हुआ है तो तार क्यों नहीं दिखता और सुबह ये लोग कहाँ चले जाते है ? पर सुबह उनकें बॉडी में आत्मा न पाकर अपने आप को बड़ा पापी महसूस किया उस दिन से प्रॉमिस भी किया की अब कभी नहीं कैद करूँगा किसी को. भगवन ने जिसको जैसा बनाया है उसे वैसे ही रहने दो और उनकी लाइफ में कोई दखलंदाजी मत करो. पर अब तो मैं ऐसा नहीं करता फिर भी क्यों नहीं दिखतें यूँ ही रात बीत जाती है आर्टिफीसियल रौशनी के नीचें पर वो शाम आज भी नहीं दिखती जब हम होते थे जुगनुओं के बीच.
पर रात में अचानक उड़ती रौशनी को देखना और उसके पीछे दौड़ने का मज़ा ही कुछ और होता है पर अब कहाँ ढूँढू उन्हें मैं.
माना की उनमें से कुछ को पकड़कर कर एक बार बोतल में बंद किया था और दिन के लिए रख लिया था पर जो भी किया था उनकी रौशनी के लिए किया था. जानना चाहता था कि उनके पीछे बल्ब लगा हुआ है क्या और अगर लगा भी हुआ है तो तार क्यों नहीं दिखता और सुबह ये लोग कहाँ चले जाते है ? पर सुबह उनकें बॉडी में आत्मा न पाकर अपने आप को बड़ा पापी महसूस किया उस दिन से प्रॉमिस भी किया की अब कभी नहीं कैद करूँगा किसी को. भगवन ने जिसको जैसा बनाया है उसे वैसे ही रहने दो और उनकी लाइफ में कोई दखलंदाजी मत करो. पर अब तो मैं ऐसा नहीं करता फिर भी क्यों नहीं दिखतें यूँ ही रात बीत जाती है आर्टिफीसियल रौशनी के नीचें पर वो शाम आज भी नहीं दिखती जब हम होते थे जुगनुओं के बीच.
कभी-कभी सोचता हूँ वो भी
बड़े हो गए होंगे हमारे जैसे क्यूंकि जब हम
बच्चें थे तो बहुत ही धमाचौकड़ी मचाया करते थे शाम होते ही पूरे गाँव में दौड़ना शुरू और फिर
छुप्पन-छुपायी खेलना, इसी बीच जुगनू भी अपने घरों से निकल आतें थे पर जैसे-जैसे गाँव शहर
बने और हम बड़े हुए जुगनू भी बड़े होते गए उन्हें भी हमारे जैसे अपने कल की चिंता सताने लगी
होगी और वो भी अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने अपने कैरिएर को लेकर कही और शिफ्ट हो गए
होंगे.
बच्चें थे तो बहुत ही धमाचौकड़ी मचाया करते थे शाम होते ही पूरे गाँव में दौड़ना शुरू और फिर
छुप्पन-छुपायी खेलना, इसी बीच जुगनू भी अपने घरों से निकल आतें थे पर जैसे-जैसे गाँव शहर
बने और हम बड़े हुए जुगनू भी बड़े होते गए उन्हें भी हमारे जैसे अपने कल की चिंता सताने लगी
होगी और वो भी अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने अपने कैरिएर को लेकर कही और शिफ्ट हो गए
होंगे.

